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पूना पैक्ट (Poona Pact) भारतीय इतिहास में

पूना पैक्ट (Poona Pact) भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी, जो महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच 24 सितंबर 1932 को हुई। यह समझौता ब्रिटिश भारत में दलित समुदाय के राजनीतिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए महत्वपूर्ण था। इसे समझने के लिए हमें उस समय की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को विस्तार से जानना होगा।

पृष्ठभूमि:

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में जाति व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव चरम पर था। दलित, जिन्हें उस समय "अस्पृश्य" कहा जाता था, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण का शिकार थे। डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और उनकी शिक्षा, सामाजिक स्थिति और राजनीतिक अधिकारों को बढ़ाने का प्रयास किया।

1930 के दशक में, जब भारत में स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था, ब्रिटिश सरकार ने भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए "साम्प्रदायिक निर्णय" (Communal Award) की घोषणा की। इस निर्णय के तहत, दलित समुदाय को अलग निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorate) देने का प्रस्ताव था। इसका अर्थ था कि दलित केवल अपने समुदाय के लोगों द्वारा चुने जाएंगे।

महात्मा गांधी का विरोध:

महात्मा गांधी, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे थे, ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। गांधी का मानना था कि अलग निर्वाचन क्षेत्र से हिंदू समाज विभाजित हो जाएगा, और यह "अस्पृश्यता" को समाप्त करने के बजाय उसे स्थायी कर देगा। उन्होंने इसे हिंदू समाज के लिए विभाजनकारी कदम माना।

गांधी ने इस निर्णय के विरोध में पुणे की यरवदा जेल में अनशन शुरू कर दिया। गांधी का अनशन पूरे देश में एक बड़ा मुद्दा बन गया, क्योंकि उनकी जान को खतरा था।

डॉ. अंबेडकर का दृष्टिकोण:

डॉ. अंबेडकर का मानना था कि दलितों को राजनीतिक अधिकार दिए बिना उनके सामाजिक उत्थान की संभावना नहीं है। उन्होंने "अलग निर्वाचन क्षेत्र" का समर्थन किया क्योंकि इससे दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और शक्ति मिलती। अंबेडकर का दृष्टिकोण था कि दलितों को उनकी पहचान और अधिकार के साथ राजनीतिक मंच पर लाना अनिवार्य है।

पूना पैक्ट:

गांधी के अनशन और राजनीतिक दबाव के कारण डॉ. अंबेडकर और अन्य दलित नेताओं को गांधी के साथ समझौते पर बैठना पड़ा। 24 सितंबर 1932 को पूना के यरवदा जेल में यह समझौता हुआ, जिसे "पूना पैक्ट" कहा गया।

पूना पैक्ट के मुख्य बिंदु:

1. सामान्य निर्वाचन क्षेत्र:

अलग निर्वाचन क्षेत्र की बजाय दलितों को सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में प्रतिनिधित्व मिलेगा।

2. आरक्षित सीटें:

प्रांतीय विधानसभाओं में दलितों के लिए 148 सीटें आरक्षित की गईं, जो पहले 71 थीं।

3. दलितों के लिए प्राथमिक चुनाव:

दलितों के प्रतिनिधियों का चयन प्राथमिक चुनावों के माध्यम से होगा, जहां केवल दलित मतदाता हिस्सा लेंगे। इसके बाद चुने गए प्रतिनिधि सामान्य निर्वाचन में हिस्सा लेंगे।

4. सामाजिक और शैक्षिक सुधार:

दलित समुदाय की शिक्षा और सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए विशेष प्रयास किए जाएंगे।

5. अस्पृश्यता का उन्मूलन:

गांधी और कांग्रेस ने अस्पृश्यता को समाप्त करने का वचन दिया और दलितों के सामाजिक उत्थान की प्रतिबद्धता जताई।

पूना पैक्ट का महत्व:

1. राजनीतिक अधिकार:

पूना पैक्ट ने दलितों को राजनीतिक अधिकार दिए और भारतीय राजनीति में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की।

2. हिंदू समाज का एकीकरण:

इस समझौते ने हिंदू समाज को विभाजित होने से बचाया और अस्पृश्यता के खिलाफ एकजुट संघर्ष का रास्ता खोला।

3. सामाजिक सुधार:

गांधी और अन्य नेताओं ने दलित समुदाय की सामाजिक स्थिति को सुधारने की दिशा में प्रयास किए।

4. संवैधानिक महत्व:

पूना पैक्ट ने भारत के संविधान निर्माण में भी प्रभाव डाला। अंबेडकर ने संविधान में दलितों और अन्य वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान जोड़े।

आलोचना:

हालांकि पूना पैक्ट ने तत्कालीन समस्या का समाधान किया, लेकिन इसकी आलोचना भी हुई:

1. अलग निर्वाचन क्षेत्र का त्याग:

कई दलित नेताओं का मानना था कि अलग निर्वाचन क्षेत्र छोड़ना एक बड़ी राजनीतिक हार थी।

2. असमानता का निराकरण नहीं:

पैक्ट के बाद भी दलितों को समान सामाजिक और आर्थिक अवसर नहीं मिले।

3. राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी:

दलितों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व सीमित रहा और उनके मुद्दों को पर्याप्त महत्व नहीं मिला।

निष्कर्ष:

पूना पैक्ट भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक सुधारों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसने दलितों को राजनीतिक अधिकार तो दिए, लेकिन उनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान की दिशा में अभी भी लंबा रास्ता तय करना था। यह पैक्ट महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर के विचारधाराओं के बीच का एक समझौता था, जिसने भारतीय समाज और राजनीति को एक नई दिशा दी।

पूना पैक्ट यह दिखाता है कि सामंजस्य और संवाद के माध्यम से समाज की बड़ी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। यह आज भी हमें सामाजिक समानता और समरसता के लिए प्रेरित करता है।


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