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मध्य प्रदेश के धार जिले का ऐतिहासिक महत्व अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। यह क्षेत्र भारतीय इतिहास, संस्कृति, और वास्तुकला के कई महत्वपूर्ण चरणों का गवाह रहा है। धार जिला विंध्य पर्वत श्रृंखला के पास स्थित है और इसकी ऐतिहासिक धरोहर प्राचीन राजवंशों, साहित्यिक परंपराओं, और सांस्कृतिक योगदानों से समृद्ध है।
प्राचीन काल
धार का प्राचीन नाम "धरनगर" या "धारानगरी" था। यह क्षेत्र मौर्य, शुंग, सातवाहन, और गुप्त साम्राज्य के शासन में महत्वपूर्ण केंद्र रहा। धार ने गुप्त साम्राज्य के दौरान कला, विज्ञान, और साहित्य के क्षेत्र में बहुत प्रगति की। यह स्थान मालवा क्षेत्र का हिस्सा था, जो भारत के सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था।
परमार वंश का शासन
धार का स्वर्णकाल परमार वंश के शासनकाल में आया, विशेषकर राजा भोज के समय। राजा भोज (1010-1055 ई.) धार के सबसे प्रसिद्ध शासक थे। उन्होंने धार को अपनी राजधानी बनाया और इसे शिक्षा, कला और संस्कृति का केंद्र बना दिया।
राजा भोज ने सरस्वती और नर्मदा नदी के तट पर भोजशाला का निर्माण करवाया, जो एक प्रमुख शिक्षण केंद्र था।
धार के आसपास के क्षेत्र में कई मंदिर और स्थापत्य कला के उदाहरण हैं, जो परमार वास्तुकला शैली को दर्शाते हैं।
मध्यकालीन इतिहास
मुगल काल के दौरान धार पर कई बार आक्रमण हुए। 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के तुगलक शासकों ने इस पर अधिकार कर लिया। 16वीं शताब्दी में यह क्षेत्र मालवा सल्तनत का हिस्सा बन गया और बाद में मुगल साम्राज्य में शामिल हुआ।
अकबर के शासनकाल में धार मालवा सूबे का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
मुगलों के पतन के बाद यह क्षेत्र मराठों के अधीन आ गया।
आधुनिक काल
18वीं शताब्दी में धार होल्कर राजवंश के अधीन हो गया, जो इंदौर पर शासन करते थे। ब्रिटिश शासन के दौरान धार एक रियासत थी और 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद इसे मध्य प्रदेश में शामिल कर लिया गया।
संस्कृति और धरोहर
भोजशाला: यह राजा भोज द्वारा स्थापित एक प्रसिद्ध शिक्षण केंद्र था, जो संस्कृत शिक्षा का मुख्य केंद्र था। इसे भारतीय विश्वविद्यालयों का प्राचीन स्वरूप कहा जा सकता है।
लाल मंदिर: धार में स्थित यह जैन मंदिर जैन धर्म की समृद्ध परंपरा को दर्शाता है।
धार किला: यह किला परमार और बाद के शासकों द्वारा निर्मित किया गया था। यह स्थापत्य कला और ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह है।
साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान
धार को भारतीय साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। राजा भोज ने कई ग्रंथ लिखे और संस्कृत साहित्य को प्रोत्साहन दिया। "सरस्वतीकंठाभरण" और "युक्तिकल्पतरु" जैसे ग्रंथ धार में रचे गए।
वर्तमान में धार
आज धार जिला अपने ऐतिहासिक स्थलों, प्राकृतिक सौंदर्य, और सांस्कृतिक धरोहरों के कारण पर्यटकों को आकर्षित करता है। यह क्षेत्र अपने पारंपरिक हस्तशिल्प और लोककला के लिए भी प्रसिद्ध है।
धार का इतिहास न केवल क्षेत्रीय बल्कि राष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, और यह भारतीय सभ्यता के विकास में एक अमूल्य योगदान प्रदान करता है।
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मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित मांडू, जिसे "मांडवगढ़" भी कहा जाता है, भारतीय इतिहास और वास्तुकला का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और समृद्ध केंद्र है। मांडू विंध्य पर्वत श्रृंखला की एक पहाड़ी पर स्थित है और इसकी भौगोलिक स्थिति इसे प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक धरोहरों का बेजोड़ संगम बनाती है।
मांडू का प्राचीन इतिहास
मांडू का प्राचीन नाम "शादीबाद" (सुख और हर्ष का शहर) था। इसका इतिहास मालवा क्षेत्र के प्रारंभिक राजवंशों से जुड़ा है। इसे गुप्तकाल और परमार वंश के दौरान महत्व प्राप्त हुआ। परमार वंश के शासक मांडू को एक सैन्य और प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित करने में सफल रहे।
मध्यकालीन इतिहास
मांडू का स्वर्णकाल 13वीं से 16वीं शताब्दी के बीच रहा, जब यह दिल्ली सल्तनत और मालवा सल्तनत का एक प्रमुख केंद्र बन गया।
दिल्ली सल्तनत: 13वीं शताब्दी में मांडू पर दिल्ली सल्तनत के तुगलक शासकों ने कब्जा किया।
मालवा सल्तनत: 1401 में दिलावर खान ग़ौरी ने मांडू को स्वतंत्र मालवा सल्तनत की राजधानी घोषित किया। उनके पुत्र होशंग शाह (1405-1435) के शासनकाल में मांडू ने एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और वास्तुकला केंद्र के रूप में ख्याति प्राप्त की।
हुमायूं और शेरशाह सूरी: 1531 में मांडू पर मुगलों का कब्जा हुआ और बाद में शेरशाह सूरी ने इसे जीत लिया।
रूपमती और बाज बहादुर की कहानी
मांडू को "प्रेम और रोमांस का शहर" भी कहा जाता है। इसकी सबसे प्रसिद्ध कहानी बाज बहादुर और रानी रूपमती की है। बाज बहादुर, जो मालवा का अंतिम स्वतंत्र शासक था, अपनी रानी रूपमती के साथ प्रेम के लिए प्रसिद्ध है। रूपमती महल और बाज बहादुर महल आज भी उनकी प्रेम कहानी के स्मारक के रूप में देखे जाते हैं।
मुगल शासन और पतन
1561 में अकबर ने मांडू पर कब्जा कर लिया और इसे मुगल साम्राज्य में शामिल कर लिया। इसके बाद मांडू धीरे-धीरे अपनी प्रमुखता खोने लगा और औपनिवेशिक काल तक यह एक ऐतिहासिक स्थल मात्र बनकर रह गया।
मांडू की वास्तुकला और प्रमुख स्थल
मांडू भारतीय, अफगान और मुगल स्थापत्य शैली का अद्वितीय उदाहरण है। यहां की इमारतें न केवल स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता भी है।
1. होशंग शाह का मकबरा:
यह भारत का पहला संगमरमर का मकबरा है और ताजमहल के निर्माण में प्रेरणा का स्रोत माना जाता है। इसकी स्थापत्य शैली मुगल वास्तुकला की प्रारंभिक झलक देती है।
2. जाहज महल (जहाज महल):
यह महल दो तालाबों के बीच बना है और देखने में जहाज जैसा प्रतीत होता है। इसे सुल्तान ग़ियासुद्दीन खिलजी ने अपने हरम के लिए बनवाया था।
3. हिंडोला महल:
इसे "झूलता महल" भी कहते हैं, क्योंकि इसकी दीवारें झुकी हुई प्रतीत होती हैं। यह अफगान स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
4. रूपमती महल:
यह महल नर्मदा नदी के दृश्य के लिए प्रसिद्ध है। इसे रानी रूपमती की नर्मदा नदी के प्रति आस्था के लिए बनाया गया था।
5. बाज बहादुर महल:
यह महल संगीत और कला का केंद्र था और बाज बहादुर की सांस्कृतिक रुचियों का प्रतीक है।
6. जल महल और अन्य तालाब:
मांडू में कई सुंदर तालाब और जल निकाय हैं, जैसे कि मुन्ना तालाब, कपूर तालाब। ये मांडू की जल प्रबंधन प्रणाली का हिस्सा थे।
7. नीलकंठ महल:
यह महल शिव भक्ति का प्रतीक है और इसे अकबर के शासनकाल में बनवाया गया था।
मांडू की सांस्कृतिक महत्ता
मांडू न केवल अपने महलों और मकबरों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह मालवा की सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपराओं का केंद्र भी रहा है।
यहां का संगीत, विशेष रूप से ध्रुपद शैली, बाज बहादुर के समय से प्रसिद्ध है।
मांडू का जिक्र मुग़ल सम्राट जहांगीर की आत्मकथा "जहांगीरनामा" में भी मिलता है।
आधुनिक मांडू
आज मांडू एक प्रमुख पर्यटक स्थल है। इसकी ऐतिहासिक धरोहर, प्राकृतिक सुंदरता, और प्रेम कहानी इसे भारत के सबसे आकर्षक ऐतिहासिक स्थलों में से एक बनाती है।
मांडू उत्सव: हर साल यहां का वार्षिक उत्सव मांडू की कला, संस्कृति, और परंपरा का प्रदर्शन करता है।
प्राकृतिक सौंदर्य: मांडू की हरियाली, झरने, और नर्मदा घाटी का दृश्य इसे प्राकृतिक पर्यटन के लिए भी खास बनाता है।
निष्कर्ष
मांडू एक ऐसा स्थान है जो प्रेम, वास्तुकला, और इतिहास का प्रतीक है। इसका हर कोना एक कहानी सुनाता है, और यह भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों को जीवंत बनाए हुए है। मांडू केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
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