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1. भारत का इतिहास: प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा (MPPSC Prelims)

भारत का इतिहास: प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा

भारतीय सभ्यता, जो विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यताओं में से एक है, ने दर्शन, साहित्य, विज्ञान, और सामाजिक संरचना के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया है। इसकी जड़ें वैदिक परंपरा, उपनिषदों के दर्शन, और बौद्ध-जैन विचारधारा में गहराई से निहित हैं। यहां भारतीय इतिहास के उन महत्वपूर्ण विचारों और संकल्पनाओं का वर्णन किया गया है जो हमारी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को परिभाषित करते हैं-

1. भारतवर्ष

अर्थ और परिभाषा:

'भारतवर्ष' शब्द भूगोल और संस्कृति का प्रतीक है। 'भारत' शब्द का उल्लेख 'भारत' राजवंश के संदर्भ में किया गया है, जो चंद्रवंशी राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत से जुड़ा है।

सांस्कृतिक एकता:

ऋग्वेद में 'जम्बूद्वीप' और 'आर्यावर्त' के नाम से भारत का उल्लेख मिलता है। यह क्षेत्र सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक है।

महत्व:

प्राचीन भारत में भौगोलिक विविधताओं के बावजूद सांस्कृतिक और धार्मिक एकता को बनाए रखने में 'भारतवर्ष' की अवधारणा का बड़ा योगदान था।

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2. वेद, उपनिषद, आरण्यक, और ब्राह्मण ग्रंथ

(a) वेद

चार वेद:

ऋग्वेद: ज्ञान का संग्रह।

सामवेद: संगीत और स्तुतियों का संग्रह।

यजुर्वेद: यज्ञ और अनुष्ठानों का ज्ञान।

अथर्ववेद: विज्ञान, औषधि, और जादू से संबंधित।

महत्व:

वेदों ने धार्मिक अनुष्ठान, सामाजिक व्यवस्था, और प्राकृतिक विज्ञान को परिभाषित किया।

(b) उपनिषद

अर्थ: उपनिषद का अर्थ 'समीप बैठना' है। ये ब्रह्म (सर्वोच्च सत्ता) और आत्मा के बीच संबंध की व्याख्या करते हैं।

प्रमुख उपनिषद: ईशावास्य, कठ, मुण्डक।

विचार:

आत्मा-परमात्मा का ज्ञान।

अद्वैतवाद और द्वैतवाद की संकल्पना।

(c) आरण्यक और ब्राह्मण ग्रंथ

आरण्यक:

वनों में ध्यान और तपस्या के दौरान लिखे गए।

ज्ञान और कर्मकांड का मिश्रण।

ब्राह्मण ग्रंथ:

यज्ञ और अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन।

सामाजिक और धार्मिक जीवन को व्यवस्थित किया

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3. षड्दर्शन (छह दर्शन)

भारतीय दर्शन छह प्रमुख शाखाओं में विभाजित है:

1. न्याय: तर्कशास्त्र।

2. वैशेषिक: परमाणु सिद्धांत और पदार्थ के गुण।

3. सांख्य: प्रकृति और पुरुष के द्वैत।

4. योग: अष्टांग योग और ध्यान।

5. पूर्व मीमांसा: कर्मकांड और यज्ञ।

6. उत्तर मीमांसा (वेदांत): अद्वैतवाद और आत्मज्ञान।

4. स्मृतियाँ

मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति जैसे ग्रंथ।

समाज व्यवस्था:

धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष के आधार पर जीवन का प्रबंधन।

विवाह, उत्तराधिकार, और अपराध व्यवस्था पर प्रकाश।

महत्व:

ये ग्रंथ सामाजिक और कानूनी प्रणाली का आधार बने।

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5. ऋत, सभा, समिति, और गणतंत्र

(a) ऋत

ऋग्वेद में 'ऋत' ब्रह्मांडीय व्यवस्था और सत्य के प्रतीक के रूप में वर्णित है।

यह प्राकृतिक और सामाजिक संतुलन का आधार है।

(b) सभा और समिति

वैदिक काल में निर्णय लेने वाली दो प्रमुख संस्थाएं:

सभा: वरिष्ठ नागरिकों की सभा।

समिति: आम नागरिकों की सभा।

(c) गणतंत्र

प्राचीन भारत में लिच्छवि और मल्ल जैसे गणराज्य।

इन गणराज्यों ने लोकतांत्रिक परंपराओं की नींव रखी।

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6. वर्णाश्रम और पुरुषार्थ

(a) वर्णाश्रम प्रणाली

चार वर्ण:

ब्राह्मण: ज्ञान और शिक्षा।

क्षत्रिय: शासन और सुरक्षा।

वैश्य: व्यापार और कृषि।

शूद्र: सेवा और श्रम।

जीवन के चार आश्रम:

ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास।

(b) पुरुषार्थ

जीवन के चार उद्देश्य:

1. धर्म: नैतिकता।

2. अर्थ: धन।

3. काम: इच्छाएं।

4. मोक्ष: मुक्ति।

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7. ऋण संस्कार

जीवन के तीन ऋण:

देव ऋण: देवताओं के प्रति।

ऋषि ऋण: ज्ञान और शिक्षा के प्रति।

पितृ ऋण: पूर्वजों के प्रति।

ये ऋण सामाजिक और धार्मिक जिम्मेदारियों का प्रतीक हैं।

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8. पंचमहायज्ञ और यज्ञ

पंचमहायज्ञ:

देव यज्ञ: देवताओं के लिए।

ऋषि यज्ञ: वेदों के प्रति।

पितृ यज्ञ: पूर्वजों के लिए।

भूत यज्ञ: प्रकृति और प्राणियों के लिए।

मनुष्य यज्ञ: अतिथियों और समाज के लिए।

यज्ञ सामाजिक, पर्यावरणीय, और आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखने का माध्यम था।

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9. कर्म का सिद्धांत

मूल विचार:

हर व्यक्ति अपने कर्मों का फल भोगता है।

पुनर्जन्म और मोक्ष कर्म पर निर्भर है।

यह सिद्धांत धर्म और समाज में अनुशासन बनाए रखने का आधार बना।

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10. बोधिसत्व और तीर्थंकर

(a) बोधिसत्व

बौद्ध धर्म में वे व्यक्ति जिन्होंने ज्ञान प्राप्ति का मार्ग चुना।

वे मोक्ष प्राप्त करने से पहले सभी प्राणियों की मदद करने की प्रतिज्ञा लेते हैं।

(b) तीर्थंकर

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर:

प्रथम तीर्थंकर: ऋषभदेव।

अंतिम तीर्थंकर: महावीर।

तीर्थंकरों ने धर्म, सत्य, और अहिं

सा का प्रचार किया।

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